👉👉 इस लेख में हम सिंधु–घाटी सभ्यता का विस्तार,शहरी योजना और सरचनाई, कृषि,पशुपालन, कारीगरी और शिल्प, व्यापार एवं वाणिज्य, राजनीतिक संगठन, धार्मिक परंपराएं, पुरुष देवता, वुक्ष और पशु की पूजा,हड़प्पा लिपि, माप–तौल, बर्तन, मोहर और मुद्रण, मूर्तियां और सिंधु सभ्यता के अंत के बारे में जाने गै।
👉सिंधु–घाटी सभ्यता का विस्तार
हड़प्पा संस्कृति की खोज सन् 1853 में एक महान उत्खनन कर्ता और खोजी ब्रिटिश इंजीनियर ए. कनिंघम का ध्यान एक हड़प्पा मुहर पर गए। लेकिन वह उसकी महत्व से वसित रहे। उसके बाद हड़प्पा स्थलों की पहचान सन् 1921 में की गई। भारतीय पुरातत्वविद दयाराम साहनी ने इस खुदाई शुरूकी।
हड़प्पा संस्कृति का मुख्य क्षेत्र सिंध और पंजाब में मुख्यतः सिंधु–घाटी में था। वहां से वह दक्षिण–पूर्व की और पंजाब,हरियाणा,सिंधु,बलूचिस्तान,गुजरात,राजस्थान और पश्चिम उत्तर प्रदेश के किनारे फैली थी। और यह उत्तर में शिवालिक से दक्षिण में अरब समुद्र तक और पश्चिम में बलूचिस्तान में मकरन तट से उत्तर पूर्व में मेरठ तक फैला था।
समुद्र के किनारे पर एक त्रिभुज जेसा स्थान का गठन किया जो लगभग
12.966 लााख वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ था।
जो कि यह प्राचीन मिस्त्री और मेसोपोटामिया की तुलना में बहुत बड़ा है।
पूरे उपमहाद्वीप में अभी तक लगभग 2800 हड़प्पा स्थलों की पहचान हो गई है।
विकसित स्थलों के सबसे महत्वपूर्ण शहरों में चे पंजाब में हड़प्पा और सिंधु में मोहन–जो–दड़ो (दोनों पाकिस्तान में है) और उसके बाद तीसरे स्थान पर चान्न्हू–दरों, चौथे स्थान पर गुजरात का लोथल,पांचवे स्थान पे उत्तरी राजस्थान का कालीबंगा(काली चुड़िया) छठा शहर बनावली हरियाणा में।
और बाद में हड़प्पा काल के संकेत गुजरात के काठियावाड़ में रंगपुर और रोजड़ी में से मिले।
👉 शहर योजना और संरचनाऍ
हड़प्पा और मोहन–जो–दड़ो दोनों के शहर दो भागों में विभाजित थे गढ़ और टिले में।
शहर के इन आवासीय व्यवस्थाओं का महत्व यह है कि वहां के शहर एक खास संरचनात्मक प्रणाली में बने थे।
जिसमें सड़के एक दूसरे को समकोण पर काटती थी।
मोहन–जो–दड़ो का महत्वपूर्ण स्थान महान स्नानागार है।
इसकी लंबाई 11.88×7.01 मीटर और गहराई 2.43 मीटर है। और तालाब के किनारे पर कपड़े बदलने के लिए छोटे कमरे थे।
मोहन–जो–दड़ो में सबसे बड़ा भवन 45.71 मीटर लम्बा और 15.23 मीटर चौड़ा एक अन्न–भंडार है। हड़प्पा के गढ़ में ऐसे छह भंडार पाए गए है।
हड़प्पा में दो कमरों की सावनी थी।
👉 कृषि:–
बहुत कम वर्षा वाला सिन्धु प्रदेश आज बहुत उपजाऊ नहीं है परंतु प्राचीन समय में उपजाऊ था।
नील नदी ने जैसे मिस्त्री का निर्माण किया वैसे सिंधु नदी ने सिंध का निर्माण किया और सिंधु वासियों को समुद्ध बनाया।
नवंबर में सिंध के लोग बाढ़ के मैदानों में बीज बातें और अप्रैल में अपनी फसल काटते थे।
वहां कोई कुदाल के हल नहीं पाया गया। लेकिन कालीबंगा मैं हल के अवशेष मिले हैं। और फसल काटने के लिए हसिया का इस्तेमाल किया गया होगा।
जल संग्रह के लिए बांधों से गिरे गबरबंन्द या नाला था।
सिंधु सभ्यता के लोगों ने गेहूं, जौ, राई,मटर जैसे खाद पदार्थ और तेली पदार्थ में तिल, सरसों जैसे उपजाए जाते थे।
ई.पू.1800 के पहले लोथल के लोग चावल और गेहूं ऊगाते थे जिसके अवशेष मिले हैं।
सिंधु के लोग कपास का उत्पादन करने वाले पहले लोग थे ।इसलिए यूनानीयाे ने यह क्षेत्र को सिन्धन (Indus) नाम दिया है।
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