Thursday, May 6, 2021

ब्रह्मांड की सामान्य माहिती

  (इस लेख में हम ब्रह्मांड की उत्पत्ति, ब्रह्मांड, आकाशगंगा , हमारी आकाशगंगा ,निहारिका,श्वेत वामन,कृष्ण छिद्र अथवा न्यूट्रॉन सितारे, और सौर मंडल की उत्पत्ति को देखेंगे।)

 ब्रह्मांड की उत्पत्ति के बारे में आधुनिक जानकारी के अनुसार, जॉर्जेस लेमिट्र ने 19 वीं शताब्दी में बिग बैग थ्योरी पेश की, और उनका विचार था कि “एक छोटे कण में बहुत सारी ऊर्जा इकट्ठा हुई और विस्फोट हुवा जिससे सितारों, उल्कापिंड, ग्रहों और उपग्रहो का निर्माण हूवा।

 फिर 1940 में, जॉर्ज गैमोव और मारियो शोनबर्ग, वैज्ञानिकों ने कहा कि “न्यूट्रिनो हमारे पूरे ब्रह्मांड की उत्पत्ति और सुपरनोवा सितारों के निर्माण में एक महत्वपूर्ण योगदानकर्ता है।“ सुपरनोवा एक विशालकाय तारा है। जो आकाश में फटता है और उसमें मौजूद रसायन पूरे ब्रह्मांड में फैल जाते हैं और उससे ग्रह, उपग्रह, तारे, उल्कापिंड आदि उत्पन्न होते हैं और इस तरह समय के साथ ब्रह्मांड की उत्पति हुई।

 फिर, बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, स्टीफन हॉकिंग नाम के एक वैज्ञानिक ने बिग बैंग थ्योरी को एक बार फिर से समझाते हुए कहा, “एक बिंदु पर मौजूद ब्रह्मांड में एक से बड़ी एक घटना हुई और बिंदु के कण एक दूसरे से दूर भागने लगे । इसे बिग बैंग अथवा महाविष्फोट कहा जाता है। और इसमें से तारे, आकाशगंगाओं आदि का निर्माण हुआ और समय बीतने के साथ एक ब्रह्मांड का निर्माण हुआ।

 लेकिन ब्रह्मांड की उत्पत्ति आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक रहस्य है। और यह समझने के लिए आज भी लंडनकि “CERN Physics lab” में “God partical” पर प्रयोग किए जा रहे हैं। जो बिग बैंग थ्योरी से जुड़ा हुआ है।

  • ब्रह्माण्ड (The Universe)

 "सूक्ष्मतम अणुओ से लेकर महाकाय आकाशगंगाओ के समूह को हम ब्रह्मांड कहते हैं।"और ब्रह्मांड अत काल तक विस्तारित है। ब्रह्मांड में उपग्रह,ग्रह,तारे,आकाशगंगा इत्यादि समस्त खगोलीय पिंड समाविष्ट है। किसी को मालूम नहीं कि ब्रह्मांड कितना बड़ा है लेकिन खगोलीय विज्ञान के अनुसार ब्रह्मांड में 100 अरब मंदाकिनीय है और हर एक मंदाकिनी में 100 अरब सितारे हैं।

  • आकाशगंगाऍ (Galaxies)

"आकाशगंगा असंख्य तारो का एक विशाल समूह होता हैं।" 

    ब्रह्मांड की रचना में आकाशगंगाए बिल्डिंग –ब्लॉक का स्थान रखती है ,अर्थात ब्रह्मांड की रचना आकाशगंगा  से होती है।

  ब्रह्मांड की आकाशगंगा ओ को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है:

 1) नियमित आकाशगंगाऍ ।

          a) सर्पिलाकार आकाशगंगाऍ 

              सर्पीलाकर आकाशगंगाओ में पुराने सितारे मध्य भाग में तथा नए एव अधिक चमकने वाले सितारे उनकी भूजाओ में पाए जाते हैं।

          b) दिर्धवुत्ताकार आकाशगंगाए

 2) अनियमित आकाशगंगाऍ ।


  • हमारी आकाशगंगा(मंदाकिनी आकाशगंगा)

हमारी आकाशगंगा का नाम मंदाकिनी हैं। इसका ब्याज लगभग 1 लाख प्रकाश वर्ष के बराबर है तथा केंद्र में इसका व्यास 10000 के बराबर है । मंदाकिनी सितारों तथा धूल से भरी हुई है तथा इसकी भुजाओं में जुड़वा सितारे पाए जाते हैं। अभी तक शुद्ध रूप से यह नहीं कहा जा सकता कि सूर्य आकाशगंगा के केंद्र से कितना दूर है परंतु  परंपरागत रूप 30,000 प्रकशवर्ष के बराबर माना जाता है।  पूरी आकाशगंगा अंतरिक्ष में परिक्रमा कर रही है। इसके केंद्रीय भाग के सितारे, बाह्य भाग के सितारों के तुलना में तीव्र गति से परिक्रमन करते हैं। हमारा सूर्य आकाशगंगा का एक चक्कर लगभग 22 करोड़ (220 Million) वर्ष में लगाता है। हमारी अकाशगंगा की सबसे नजीक कि अकाशगंगा एंड्रोमेडा हैं। जो हमारी आकाशगंगा से 2.2 मिलियन प्ररकाश–वर्ष की दूरी पर थीर हैं। प्रक्सिमा सेंचूरी  सूर्य का निकट का तारा है। जो सूर्य सेे 4.3 प्रकाशवर्ष दूर हैं।  


निहारिका (Nebula)

सूर्य के द्रव्यमान से 1.4 गुना भारी तारे अपने द्रव्यमान को नियंत्रित न कर पाने से उसका केंद्र अचानक संकुचित हो जाता है। जिससे एक महाकाय विस्फोट होता है। जिसे सुपरनोवा भी कहते हैं जिसमें से फेंके गए पदार्थ मंदाकिनीओ में गिरते हैं और वह समय के अनुसार धूल के बादल मैं रूपांतरित हो जाते हैं। जिसे निहारिका कहते हैं । यदि  निहारिका केेेेेेे बादल की गैस उज्जवलेेत हो जाए तो निहारिका चमकने लगती है।


  • श्वेत वामन: –

 श्वेत वामन सितारे किसी समय सामान्य सितारों के भ्राति थे धीरे-धीरे उनका प्रज्वलन के लिए इनके नाभिक ईंधन समाप्त हो जाता है। तब वह अपनी मुत्यु की ओर बढ़ते हैं। और जो बसे हुए तारे का द्रव्यमान सूर्य से 1.4 गुना हो जाए तो वे श्वेत वामन तारा बन जाता है।जिसका आकार पृथ्वी जैसा बन जाता है परंतु उनका धनत्व सूर्य के समान होता है और जल की तुलना में उनका घनत्व दस लाख गुना हो जाता है।

ऐसा तभी संभव होता है जब इलेक्ट्रॉन अपना स्थान बदलकर नाभि के नजदीक आ जाए और श्वेत वामन तारे धीरे धीरे मंद होते होते काले वामन के रूप में मंद हो जाते हैं। जिसके कारण वे ठंडा और धुंधला पड़ जाता है और उसकी अंतिम अवस्था कृष्ण वामन की हो जाती है।

  • कृष्ण छिद्र अथवा न्यूट्रॉन सितारे:–

  1.4 सौर द्रव्यमान से भारी "शेष तारा केंद्र" का गुरुत्व कुछ सीमा तक प्रमाणिवक तथा नाभीकिय बलों पर प्रभावी हो जाता है। जिससे तारा का केंद्र न्यूट्रॉनिक एक भारी गेंद  बन जाता है ।जिसे न्यूट्रॉन तारा कहते हैं।

  • सौर मंडल:–

सूर्य के परिवार को सौरमंडल कहतेे हैं। सौरमंडल में आठ ग्रह, एक छोटा ग्रह प्लूटो, बहुत से चंद्रमा तथा अनगिनत ग्रहिकाएं , उल्काए, धूमकेतु आदी सम्मिलित हैै जो सूर्यय के चारों ओर परिक्रमा करते है। ऊष्मा तथा प्रकाश सूर्यसे आता है।

  • सौर मंडलकी उत्पत्ति :–

कहा जाता है कि ,अंतरिक्ष में अवस्थित विशाल बादलों में गुरुत्वाकर्षण के नष्ट होने के कारण सौरमंडल की उत्पत्ति हुई सूर्य से दूर जाते हुए ग्रहों की संरचना एवं घनत्व में विभिन्न इस तथ्यको सिद्ध करते हैं। उदाहरण के लिए जो ग्रह सूर्य के निकट है ,वह चट्टानो तथा धातु के बने हुए हैं जो उसे तापमान पर बने थे । इसके विपरीत सूर्य से अधिक दूरी पर पाए जाने वाले ग्रहों की उत्पत्ति ऐसी धातूओ से हुई जो कम अथवा निम्न तापमान पर ढोस होती है।

अधिकतर वैज्ञानिकों का विश्वास है कि ब्रह्मांड की उत्पत्ति लगभग 15 अरब वर्ष पूर्व हुई थी। इसके संबंध में कहा जाता है कि भारी बिग बैक धमाका हुआ था। इस धमाके के फलस्वरुप भौतिक पदार्थों ने बिखर कर मंदाकिनीयो, सितारों तथा ग्रहों का रूप धारण कर लिया। वैज्ञानिकों का विचार है कि हमारे सौरमंडल की उत्पत्ति मंदाकिनी आकाशगंगा की ऐरावत नाम कि भूजा में हुई थी। आकाशगंगा की इस भूजा में एक हल्का ठंडी गैस का बादल था । इस बादल की मुख्य गैसों में हाइड्रोजन, हीलियम, ऑक्सीजन ऐव लोह इत्यादि थे। यह बादल धीरे-धीरे चक्कर लगाने लगा। तत्पश्चात उस बादल के गुरुत्वाकर्षण शक्ति का पतन आरंभ हुआ और उसमें गैस के घूमते हुए चक्र उत्पन्न हुए । जीन के आंतरिक भाग का तापमान अत्याधिक था। गैस के यह डिस्क धीरे-धीरे ठंडे होकर सौरमंडल का रूप धारण कर गये। सूर्यके किरण को पृथ्वी पर पहोसनेमे 8 मिनिट ओर 20 सेकंड्स लगती है।


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