Thursday, July 8, 2021

नाबार्ड (NABARD)

✍️ इस लेख में हम नाबार्ड का परिचय,भारत में नाबार्ड किस तरीके से आया,नाबार्ड की स्थापना,नाबार्ड की प्रबंधन व्यवस्था,नाबार्ड की स्थापना के मुख्य उद्देश्य,नाबार्ड के कार्य एवं नाबार्ड योजना के तहत किन बैंकों से खेडुतो को ऋण मिलता है उसके बारे में जानेंगे।

नाबार्ड का परिचय।

👉भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा 30 मार्च 1979 में गठित श्री.बि.शिवरमन समिति की सिफारिशों पर कृषि साख की समस्याओं का अध्ययन करके  (national bank for agriculture and rural development )   “राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकाश बैंक” की स्थापना 12 जुलाई 1982 को की गई थी। कृषि शाखा के लिए यह शीर्ष बैंक है इसकी स्थापना ग्रामीण क्षेत्रों में कृषि,लघु उद्योग और कुटीर उद्योग तथा ग्रामीण आर्थिक क्रियाओं के प्रोत्साहन के लिए इसकी स्थापना की गई है।

भारत में नाबार्ड किस तरह से आया।

👉भारतीय अर्थतंत्र को गठित करने तथा गति देने के लिए ग्रामीण अर्थव्यवस्था का विकास करना बहुत जरूरी था। इसके लिए भारतीय ग्रामीण क्षेत्र के विभिन्न पासा के अध्ययन करने के लिए भारत सरकार ने निर्देशानुसार भारतीय रिजर्व बैंक को कृषि और ग्रामीण विकास के लिए संस्थागत ऋण उपलब्ध करानेकी व्यवस्था की समीक्षा की और अंतः 30 मार्च,1979 को क्रेफिकार्ड समिति का गठन किया गया। इस समिति का गठन योजना आयोग के पूर्व सदस्य श्री.शिवराम के अध्यक्षता में हुआ। इसलिए इस समिति को शिवरामन समिति भी कहते हैं।

👉इस समिति ने 28 नवंबर,1970 को एक रिपोर्ट प्रस्तुत किया। जिसमें ग्रामीण विकास से जुड़े ऋण से संबंधित मुद्दों पर सरकार का ध्यान एकत्रित करने और भारतीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संगठनात्मक ढांचा देने की बात रखी गई थी।

👉भारतीय संसद द्वारा 1981 को अधिनियम 61 के माध्यम से N.A.B.A.R.D के गठन को पारित किया गया।

भारत में नाबार्ड की स्थापना।

👉12 जुलाई,1982 को भारतीय रिजर्व बैंक के ऋण संबंधित कार्यों और तत्कालीन कृषि पुनर्वित और विकास निगम (M.R.D.C) के पुनर्वित के अंतरण द्वारा NABARD की स्थापना हुई।
👉नाबार्ड का मुख्यालय मुंबई में है। नाबार्ड की शुरुआत 100 करोड़ की पूंजी से हुई थी जिसमें 50% हिस्सा केंद्र सरकार का था और 50% हिस्सा रिजर्व बैंक का था। नाबार्ड 28 क्षेत्रीय कार्यालय एवं 6 प्रशिक्षण संस्था की मदद से कार्य करता है।

नाबार्ड की प्रबंध व्यवस्था।

👉भारत सरकार ने नाबार्ड की प्रबंध की जिम्मेदारी निदेशक मंडल को सौंपी है।
 👉इस निदेशक मंडल में 15 सभ्य होते हैं। जिसमें अध्यक्ष (नाबार्ड का अध्यक्ष भारतीय रिजर्व बैंक का डिप्टी गवर्नर होता है) एक प्रबंध निदेशक । इस दोनों का कार्यकाल 5 वर्ष का होता है और बाकी सदस्यों का कार्यकाल 3 वर्ष का होता है। जिसमें भारत सरकार के 3 निर्देशक, RBI के 3 निदेशक, 4 राज्य सरकार के अधिकारी (जिस राज्य में नाबार्ड की ब्रांच हो उसके) एवं 3 निदेशक ऐसे कि जिन्हें सरकारी, बैंकिंग एवं व्यापारिक कार्य का अनुभव है।

नाबार्ड की स्थापना के मुख्य उद्देश्य।

👉उसका प्रथम उद्देश्य ग्रामीण विकास को निर्धारित करके योग्य दिशा देना।
👉ग्रामीण अर्थव्यवस्था को विकसित बनाने के लिए ऋण प्रदान करना।
👉लघु एवं कुटीर उद्योगों के लिए ऋण प्रदान करना।
👉ग्रामीण क्षेत्रों में लोन देने वाली बैंक को एवं संस्थाओं को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराना।
👉ग्रामीण विकास के क्षेत्र में बैंकिंग व्यवस्था का समय–समय पर जांच करना एवं नियंत्रण करना तथा मूल्यांकन करना।
👉नवीनीकरण ऊर्जा को बढ़ावा देना।
👉कृषि एवं ग्रामीण योजनाओं का मूल्यांकन करना एवं क्रियान्वयन करना।
👉ग्रामीण विकास के लिए सूक्ष्म लोन उपलब्ध कराना।

नाबार्ड के कार्य।

✍️नाबार्ड के मुख्य कार्य निम्नलिखित है।
1) प्रारंभिक ऋण उपलब्ध कराना।
2) विकास कार्य।
3) कृषि से संबंधित बैंकों में नियमितता के कार्य।
4) गैर कृषि क्षेत्रों में सहायता देना।

1) प्रारंभिक ऋण उपलब्ध कराना।
      1.1) अल्पकालीन ऋण।
      1.2) मध्यकालीन ऋण।
      1.3) दीर्घकालीन ऋण।

1.1) अल्पकालीन ऋण।
👉यह ऋण 3 महीने से 15 महीने की अवधि के लिए होता है ।इसको मौसमी कृषि ऋण योजना भी कहते हैं। यह ऋण सीमाओं की मजूरी के माध्यम से राज्य सरकार बैंकों से क्षेत्रीय ग्रामीण बैंकों के द्वारा अल्पकाल के लिए प्रदान किया जाता है।
अल्पकालीन ऋण मिलने से खेडुत क्या-क्या कार्य कर सकेंगे।
1) कृषि और संबंधित कार्य।
2) फसलों के वितरण के लिए।
3) मत्स्य क्षेत्र।
4) औद्योगिक सहकारी समितियों को ऋण।
5) लघु वन उपज के संग्रह,  श्रम ठेका और वन श्रम सहकारी समितियों को ऋण।

1.2) मध्यकालीन ऋण।
👉यह ऋण 1 वर्ष से 5 वर्ष की अवधि के लिए होता है । मध्यकालीन ऋण के अंतर्गत वह किसान सम्मिलित हैं ।जिनका फसल प्राकृतिक आपदाओं के कारण नष्ट हुआ है।इस सुविधा के अंतर्गत उनको अल्पकालीन को मध्यकालीन ऋण में बदल दिया जाता है।

1.3) दीर्घकालीन ऋण।
👉दीर्घकालीन ऋण की व्यवस्था निम्नलिखित क्षेत्रों में आए–सर्जक संपत्तियों का निर्माण करता है। इसके अंतर्गत निम्नलिखित क्षेत्र शामिल है।
   1) कृषि और उससे संबंधित कार्य।
   2) लघु उद्योग,छोटे उद्योग,कारीगर एवं हस्तशिल्प आदि।
   3) ग्रामीण गरीबों के बीच काम करने वाली संस्था।

2) विकास कार्य।

👉 नाबार्ड भारतीय कृषि एवं ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के लिए ऋण उपलब्ध कराता है। उसके साथ ही कृषि यंत्रो आदि की भी व्यवस्था करता है। जिससे फसल की उत्पादकता में वृद्धि होने के साथ-साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी समृद्ध होती है। जो देश के विकास का सूचक है।
एवं भारत सरकार ने नाबार्ड के अंतर्गत “ग्रामीण बुनियादी सुविधा विकास कोष” का गठन किया है। इस कोष की स्थापना का उद्देश्य सरकार को मध्यम एवं लघु सिंचाई, भूरक्षण,जल सुरक्षा और जल संग्रह प्रबंधन के वित्त पोषण के लिए ऋण प्रदान करना है।

3) कृषि से संबंधित बैंकों में नियमितता के कार्य।

👉नाबार्ड कृषि क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने के क्षेत्र में सदैव तत्पर रहता है। जिसके लिए नाबार्ड नए-नए स्थानों पर शाखाएं खोलना तथा कृषि क्षेत्र में ऋण दे रहे बैंकों पर निगरानी रखने जैसे कार्य कर्ता है। कृषि क्षेत्र में बैंकों के लिए बनाए गए नियमों का पालन हो रहा है कि नहीं इसके नियमित ता का आकलन भी नाबार्ड करता है।

4) गैर कृषि क्षेत्रों में सहायता देना।

👉गैर कृषि क्षेत्रों जैसे छोटे एवं लघु उद्योग,हस्तशिल्प  को बढ़ावा देना भी नाबार्ड के कार्य में शामिल है। इन क्षेत्रों में ऋण उपलब्ध कराना तथा उसकी निगरानी नाबार्ड ही रखता है।


नाबार्ड योजना के तहत किन बैंकों से लोन मिलता है।

1) राज्य सहकारी कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक।
2) क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक।
3) राज्य सहकारी बैंक।
4) जिला सहकारी बैंक।
5) वाणिज्य बैंक।
6) कृषि विकास वित्त कंपनी।
7) उत्तर–पूर्व विकास वित्त निगम
8) अनुसूचित प्राथमिक शहेरी सहकारी बैंक।
9) गैर–बैंकिंग वित कंपनियां।


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